Tuesday, September 11, 2018

माँ कालिंका का एक रहस्य यह भी......

मान्यता है कि माता के दर पर आने वाले निसंतान दंपतियों को संतान का सुख जरूर म‌िलता है। नई टिहरी से बटखेम गांव बपांच किलोमीटर दूर पड़ता है। ये गांव 57 परिवारों वाला गांव है। इसी गांव में मां कालिंका का भव्य मंदिर है। हर रविवार को मंदिर परिसर में एक खास पूजा-अर्चना होती है। माता की डोली का आह्वान किया जाता है। इसके बाद मां खुद भक्त को अपने पास बुलाती है और उसकी समस्या का समाधान करती है।
यहां दूर-दराज के क्षेत्रों से लोग अपनी परेशानियां लेकर आते हैं। मान्यता है कि देवी का पश्वा थाली से एक मुठ्ठी चावल लेता हैं। इसके बाद पानी से भिगोकर उसी समय हाथ पर हरियाली तैयार करते हैं। इसके बाद अपने छत्र से दीवार पर भक्तों की समस्या लिखी जाती है। समस्या के साथ साथ समस्या का समाधान भी लिखा जाता है। इस मंद‌िर में उत्तराखंड के ही नहीं बल्क‌ि देश विदेश से लोग आते हैं। खास बात ये है कि यहां द‌िल्ली, मुंबई, राजस्थान से कई फर‌ियादी आते हैं। हर भक्त की मनोकामना को मां पूर्ण करती हैं। उत्तराखंड की कुछ खास वजहें हैं और इन वजहों से ही इसे देवभूमि का दर्जा दिया गया है। ये ही वो मंदिर है जहां विज्ञान भी फेल हो चुका है। हर बार यहां ऐसे ऐसे चमत्कार होते हैं कि खुद वैज्ञानिक भी हैरान हो जाते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि आज माता से आशीर्वाद लेने वालों में कई वैज्ञानिक भी हैं।

Sunday, September 9, 2018

माँ कालिंका के मंदिर बटखेम तक पहुंचने की जानकारी

माँ कालिंका के मंदिर बटखेम राजधानी दिल्ली से लगभग ३२० किमी दूर है। आप दिल्ली से हवाई यात्रा, रैल यात्रा या फिर गाड़ी के माध्यम से पहुँच सकते हैं। 
हवाई मार्ग द्वारा आपको दिल्ली से जोलीग्रांट एयरपोर्ट तक हवाई जहाज के माध्यम से तथा उसके बाद जोलीग्रांट से बस या टेक्सी की मदद से चम्बा (टिहरी गढ़वाल) होते हुए भोनाबागी तक आ सकते हो। भोनाबागी के बाद आपको लगभग २ किमी पैदल चल कर माँ के मंदिर तक पहुँच सकते हो।  
रेल मार्ग द्वारा आपको दिल्ली से ऋषिकेश तक रेल के माध्यम से आ सकते उसके बाद पहाड़ों में आपको गाड़ी द्वारा ही अपनी यात्रा पूर्ण करनी होगी। 
सड़क मार्ग द्वारा आप दिल्ली से बस, टेक्सी के माध्यम से आसानी से माँ के मंदिर तक पहुँच सकते हो।  

माँ के मंदिर तक पहुँचने का सम्पूर्ण पता 

राज्य - उत्तराखंड 
जिला - टिहरी गढ़वाल 
ग्राम -  बटखेम 

Saturday, September 8, 2018

देवी भगवती माँ का सबसे शक्तिशाली रूप माँ काली

इस संसार को अन्याय और अत्यचार से मुक्त करने की खातिर सभी देवी देवताओं ने अपनी शक्तियों और तेज को मिलाकर एक महाशक्ति को जन्म दिया जिस माँ को हम देवी माँ भगवती माँ काली के रूप से जानते हैं।
 देवी माँ काली भगवती का शक्ति रूप है  चण्ड और मुंड का संहार करने वाली माता को हम माँ चामुंडा के नाम से भी जानते हैं और उनकासाँवला  काला होने के कारण ही उनका नाम देवी माँ काली पड़ा।


काली माता को प्रसन्न करने के लिए तथा घर में सुख शांति के लिए इन मंत्रों का जाप करना चाहिए:
ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा
ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै:
सर्वमंगमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुते।
 

Friday, September 7, 2018

मां काली के उत्‍पन्‍न होने की कथा...

मां काली के उत्‍पन्‍न होने की कथा..


एक बार दारुक नाम के असुर ने ब्रह्मा को प्रसन्न किया. उनके द्वारा दिए गए वरदान से वह देवों और ब्राह्मणों को प्रलय की अग्नि के समान दुःख देने लगा. उसने सभी धर्मिक अनुष्ठान बंद करा दिए और स्वर्गलोक में अपना राज्य स्थापित कर लिया. सभी देवता, ब्रह्मा और विष्णु के धाम पहुंचे. ब्रह्मा जी ने बताया की यह दुष्ट केवल स्त्री दवारा मारा जायेगा. तब ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देव स्त्री रूप धर दुष्ट दारुक से लड़ने गए. परतु वह दैत्य अत्यंत बलशाली था, उसने उन सभी को परास्त कर भगा दिया.
ब्रह्मा, विष्णु समेत सभी देव भगवान शिव के धाम कैलाश पर्वत पहुंचे तथा उन्हें दैत्य दारुक के विषय में बताया. भगवान शिव ने उनकी बात सुन मां पार्वती की ओर देखा और कहा हे कल्याणी जगत के हित के लिए और दुष्ट दारुक के वध के लिए में तुमसे प्रार्थना करता हुं. यह सुन मां पार्वती मुस्कराई और अपने एक अंश को भगवान शिव में प्रवेश कराया. जिसे मां भगवती के माया से इन्द्र आदि देवता और ब्रह्मा नहीं देख पाए उन्होंने देवी को शिव के पास बैठे देखा.
मां भगवती का वह अंश भगवान शिव के शरीर में प्रवेश कर उनके कंठ में स्थित विष से अपना आकार धारण करने लगा. विष के प्रभाव से वह काले वर्ण में परिवर्तित हुआ. भगवान शिव ने उस अंश को अपने भीतर महसूस कर अपना तीसरा नेत्र खोला. उनके नेत्र द्वारा भयंकर-विकराल रूपी काले वर्ण वाली मां काली उत्तपन हुई. मां काली के लालट में तीसरा नेत्र और चन्द्र रेखा थी. कंठ में कराल विष का चिन्ह था और हाथ में त्रिशूल व नाना प्रकार के आभूषण व वस्त्रों से वह सुशोभित थी. मां काली के भयंकर व विशाल रूप को देख देवता व सिद्ध लोग भागने लगे.
मां काली के केवल हुंकार मात्र से दारुक समेत, सभी असुर सेना जल कर भस्म हो गई. मां के क्रोध की ज्वाला से सम्पूर्ण लोक जलने लगा. उनके क्रोध से संसार को जलते देख भगवान शिव ने एक बालक का रूप धारण किया. शिव श्मशान में पहुंचे और वहां लेट कर रोने लगे. जब मां काली ने शिवरूपी उस बालक को देखा तो वह उनके उस रूप से मोहित हो गई. वातसल्य भाव से उन्होंने शिव को अपने हृदय से लगा लिया तथा अपने स्तनों से उन्हें दूध पिलाने लगी. भगवान शिव ने दूध के साथ ही उनके क्रोध का भी पान कर लिया. उनके उस क्रोध से आठ मूर्ति हुई जो क्षेत्रपाल कहलाई.
शिवजी द्वारा मां काली का क्रोध पी जाने के कारण वह मूर्छित हो गई. देवी को होश में लाने के लिए शिवजी ने शिव तांडव किया. होश में आने पर मां काली ने जब शिव को नृत्य करते देखा तो वे भी नाचने लगी जिस कारण उन्हें योगिनी भी कहा गया.

Thursday, September 6, 2018

MAA KALINKA CHAMTKARI DOLI BATKHEM TEHRI GARHWAL UTTARAKHAND

हेलो दोस्तों ,
                 आज  मैं आप सब को बताने वाला हूँ सिद्धपीठ  माँ कालिंका के डोली स्वरूप के बारे में जहाँ माँ स्वयं डोली रूप में विध्यमान होकर भक्तों के दुःख दूर करती है। यह पवित्र स्थान उत्तराखण्ड राज्य के टिहरी जिले में बटखेम  गावं में स्थित  है। जहाँ माँ प्रत्येक रविवार डोली रूप में भक्तों को दर्शन देती है तथा उनकी मनोकामनाएं और कस्ट दूर करती है।  माँ कालिंका के बारे में मान्यता है की कोई भक्त तभी माँ के दरबार में आ सकता है जब उस भक्त के लिए माँ का बुलावा आये।  
            इस स्थान में माँ के जो भक्त हैं जिन पर माता अवतरित होती है वह अपने हाथ में चावल के दानो पर गंगाजल और दूध की मदद से हरियाली भी जमा देते हैं।  निःसंतान लोग माँ के मंदिर में सन्तान प्राप्ति के लिए तथा लोग तरह तरह के क्स्टों के निवारण हेतु माँ के माँ के दरबार में जाते हैं।   
  


माँ कालिंका मंदिर  बटखेम 






माँ  कालिंका डोली 

       


माँ कालिंका नृत्य